रज़िया के जीवन की पृष्ठभूमि कुछ ऐसी है कि रज़िया को (जो पहले लक्ष्मी थी) उसके पिता ने शहर पढ़ने के लिए भेजा था। लक्ष्मी और आमिर दोनों प्रो. शास्त्री के शिष्य थे, धीरे - धीरे वे दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं, प्रो. शास्त्री के प्रगतिशील विचारों के चलते लक्ष्मी को अपना धर्म और पिता छोड़कर आमिर से विवाह करने के लिए इस्लाम मजहब कुबूल करना पड़ता है, लेकिन तथाकथित 'प्रगतिशील' आमिर अपना मजहब छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता है।
उधर लक्ष्मी के पिता ने आमिर के धर्म परिवर्तन के लिए कहते हैं, लेकिन आमिर मना कर देता है, फिर भी लक्ष्मी आमिर से रजिया बन कर निकाह करती है। लक्ष्मी के पिता नरसिम्हा गौड़ा अपनी इकलौती बेटी से सारे संबध समाप्त कर देते है। लेकिन बेटी के इस कदम के चलते एक पिता का हृदय तार- तार हो गया था। वह सोचते थे बेटी किसी और धर्म में गई तो, उस धर्म में ऐसी क्या बात है? वह अपनी सारी जिम्मेदारियां और कार्य को बंद करते हुए, अपने आप को एक कमरे में बंद कर लेते हैं और पूरे इस्लाम का अध्ययन शुरू करते हैं। अपने पिता के मृत्यु के बाद जब रजिया घर पहुंची तो अठारह वर्ष हो चुके थे। रजिया ने पाया कि उसके पिता ने इस्लाम और इतिहास के अध्ययन के लिए एक पुस्तकालय बना लिया है। उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती थीं, लेकिन अपने बुढ़ापे में उन्होंने अंग्रेज़ी सीखी जिससे वह उन पुस्तकों का अध्ययन कर सकें जो कन्नड़ भाषा में उपलब्ध नहीं है। लक्ष्मी को उस पुस्तकालय में अनेकों लेखक की पुस्तकें मिलती हैं। वह उन सबका अध्ययन शुरू करती है।
परेश जी आगे बताते हैं कि - "वेदांत दर्शन में दो अवधारणा है “आवरण और विक्षेप” सत्य पर पर्दा डालने को आवरण कहतें हैं, और असत्य के प्रचार को विक्षेप कहते हैं। लक्ष्मी को अध्ययन के समय प्रो. शास्त्री जैसे लोगों द्वारा फैलाए जा रहे विक्षेप का पता लगता है, सत्य पर फैले आवरण का अनावरण होता है।
यह कहानी रज़िया के वापस लक्ष्मी बनने की यात्रा है। यह कहानी भारत के सच्चे इतिहास के साथ वामपंथीयों द्वारा किए गए कुकृत्य की कहानी है। प्रो.शास्त्री जैसे लोगों ने देश की जनता से उनका सच्चा इतिहास छिपा कर, इतिहास का सबसे बड़ा पाप किया है। यह कहानी नरसिम्हा गौड़ा और एक पिता के रूप अपने संततियों के लिए तड़प रही सभ्यता की कहानी है।
आलोचकों ने उपन्यास की खूब आलोचना की है, इसे बहुत ही कटू उपन्यास बताया है, लेकिन एस.एल भैरप्पा ने इसी उपन्यास में कहा है “यदि आपने सच बोलना तय कर लिया है तो, आवाज़ मीठी है या कड़वी इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता।”
बता दें कि यंग थिंकर्स फोरम युवाओं का एक वैचारिक मंच है, जो युवाओं के बौद्धिक परिष्कार का कार्य करता है। इसके अंतर्गत पुस्तक परिचर्चा, ग्रुप डिस्कशन, हैरिटेज वॉक आदि आयोजित करवाए जाते हैं, जिससे भारतीय युवाओं को भारतीयता के निकट ले जाने का प्रयास किया जाता है।
इस पुस्तक परिचर्चा में आईआईटीएम के प्रोफेसर श्री रामकृष्ण कोंगाला, छात्र गण एवं वाईटीएफ के सदस्य पुष्पेंद्र गुर्जर जी, प्रबल गुप्ता जी, सूरज दीक्षित जी प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।